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मैं तो तेरे आँगन की हू चिराई...

Posted On: 4 Jun, 2014 Others,कविता,Junction Forum में

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कभी-२ हमारा मन उस काम को करने की अनुमति नही देता जो इस दुनिया की नज़रों में गलत होता है… चाहे वो काम कितना भी पवित्र क्यों ना हो या दूसरे मायनो में किसी की ज़िन्दगी सवांरने का एक सफल प्रयास ही क्यों ना हो… लेकिन कहते है ना ये दुनियां की रीत ऐसी होती है जो इंसान को जीना सिखा देती है या उसे जीते जी मार डालती है… ऐसी ही ये कविता इस मानसिकता को प्रदर्शित करती है-
जहाँ एक बेटी अपनी माँ को कह रही है की कम उम्र में उसकी शादी दुनियां के बहकावे में आकर मत करे और दूसरी ओर उसकी माँ जो समाज से खौफ खाकर दिन-रात अपनी बेटी की शादी की चिंता में खोयी रहती है… आज भी ऐसी बातें भारत जैसे महान देश में देखने को मिलती है… जहाँ ना जाने आज भी कितनी ही बेटियां सिर्फ समाज के डर और बहकावे में आकर शादी के बंधन में बाँध दी जाती है…
ओ री माँई… कैसी ये दुविधा आयी…
मैं तो तेरे आँगन की हू चिराई…
क्यों तू ना समझे मेरे मन की कसक…
क्यों है आज तुझे उलझन करने की मेरा लगन…
क्या मैं पल रही हू तुझ पर बनकर बोझ…
या अब ना रहा तुझे मुझसे कोई अब रोझ…
बन्ध जाउंगी बनकर घंटी दूजे खूंटे से…
सोच क्या रह जायेंगे मेरे सपने टूटे से…
सहकर दुनियां की बोझिल अनगिनत ये रीत…
पहले ही कई बार मर चुकी मैं बनकर कीट…
इस दुनियां में बनकर आई हू तेरी मैं दुलारी…
फिर क्यों आज बन गयी मैं तेरी ही आँखों की लचारी…
क्यों तू रोये क्यों तू तरसे देखने को मुझको एक दुल्हन…
क्यों तू नही खुश होती अपने पैरों में मुझे चलता देख कर…
तू रात-२ भर जागे जोड़ने को मेरे करम…
पर तू क्यों ना समझे ये सब तो हैं दुनियां के कितने भरम…
गलती कहू ना मैं तेरी ये माँई…
डरती हैं तू भी कही
मुझे खींच ना ले जाएं दुनियां की ये अँधेरी खाई…
रह ना जाये अरमान ये तेरे…
जल रही हू मैं अब अपने टूटे सपनो को सेज़ें…
क्यों कर दी तूने अपनी लाड़ली से ऐसी रुश्वाई…
कैसी ये दुविधा आई…
ओ री माँई…मैं तो थी तेरे आँगन की चिराई …

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23 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Neha Verma के द्वारा
June 5, 2014

धन्यवाद शिल्पा जी कविता का मंथन करने के लिए… आपने सही कहा कि समाज में आज भी न जाने कितनी ही लड़कियां इस पीड़ा को सहन करती है…

meenakshi के द्वारा
June 5, 2014

नेहा वर्मा सच में एक माँ अपनी बेटी के उज्जवल भविष्य की कामना के साथ उसके सुखी पारिवारिक जीवन की भी चाह रखती है – और समाज का नापाक व्यक्तियों का भय तो हर किसी को कुछ न कुछ तो होता है शायद इसी लिए वो ऐसा करती है . आज भी आपने ने जो दृश्य दर्शाया है –कहीं न कहीं दिखाई देता है . समाज सुधार की ओर इंगित कराती रचना के लिए आपको बधाई ! मीनाक्षी श्रीवास्तव

Ravinder kumar के द्वारा
June 6, 2014

नेहा जी, आपने उचित ही लिखा है के ना जाने कितनी ही बेटियां हैं जिन्हें समाज के भय से जल्दी ब्याह दिया जाता है. वे कन्याएं अपने सपनों को अपने दिल में दबाकर माँ-बाप के सम्मान की खातिर चुप-चाप सब सह लेती हैं. ना जाने कितने ही उदाहरण हमारे आस-पास बिखरे पड़े हैं, जो बताते हैं , यदि लड़कियों को समय और मौका मिले तो वे बेहतरीन कर सकती हैं. भावनाओं से भरी बेहतरीन कविता के लिए आपको बधाई.

swati के द्वारा
June 6, 2014

very nice heart touching lines……….

swati के द्वारा
June 6, 2014

Very nice heart touching lines neha ji….

swati के द्वारा
June 6, 2014

बहुत अच्छी हार्ट टचिंग लाइन्स नेहा जी ………आज जो हमारे समाज में हो रहा है ..आपने इन लाइन्स के माध्यम से एक बेटी ली उसी तकलीफ को बड़ी सुंदरता से वर्णित किया है….

Neha Verma के द्वारा
June 6, 2014

धन्यवाद स्वाति जी कविता का मंथन करने और अपने भाव प्रकट करने के लिए… :)

Neha Verma के द्वारा
June 6, 2014

धन्यवाद रविन्द्र जी कविता का मंथन करने के लिए. आपने सही कहा यही सबसे बड़ी समस्या है हमारे समाज की, वो आज भी इतना जागरूक नही है कि लड़कियों को बराबरी का हक़ दे सके…

Neha Verma के द्वारा
June 6, 2014

धन्यवाद मिनाक्षी जी कविता के मंथन के लिए… :)

pkdubey के द्वारा
June 7, 2014

सादर ,भावात्मक और मार्मिक रचना.

Neha Verma के द्वारा
June 7, 2014

धन्यवाद योगी जी… :)

Neha Verma के द्वारा
June 7, 2014

धन्यवाद दुबे जी… :)

yamunapathak के द्वारा
June 11, 2014

neha जी बहुत भावपूर्ण है पंक्तियाँ

Neha Verma के द्वारा
June 11, 2014

dhanyabad Yamuna ji…

Veer Suryavanshi के द्वारा
June 12, 2014

नेहा जी !! ” मैं तो तेरे आँगन की हू चिराई…” बहुत ही मर्मस्पर्शी एवं तथ्यपूर्ण कविता है ! आपको बधाई देते हुए अनुरोध करता हु कृपया एक बार इस पर भी नज़र डाले – http://veersuryavanshi.jagranjunction.com/2014/05/28/%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%90-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%b9%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%ac%e0%a4%a4-2/

Neha Verma के द्वारा
June 13, 2014

ji yogi ji bilkul khatam ho jayegi… lekin aaj bhi pichhade ilako jaise Rajasthan, Hariyana ke ghanv me andhadhundh dekhne ko milti hai aisi reeti…


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