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जिन्दा हूँ मैं इसीलिए ज़िन्दगी हैं

Posted On: 11 Nov, 2014 Others,social issues,कविता में

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कुछ पंक्तियाँ गृह कलह की जंजीरो को तोड़कर स्त्री के अपने अधिकार के लिए लड़ने और खुद के लिए सोचने पर…

दो लब्ज़ो में ढूंढ रही हूँ अपनी वो दास्तां।
बैठी अकेले सोच रही हूँ पुराने दिन बार-२,
वो खिलखिलाता बचपन तो वो प्यारी सी गुड़ियाँ.
वो सपनो के जहाज तो वो चिड़ियाँ सी उड़ने की तमन्ना.
शायद अभी भी ज़िंदा हूँ मैं इसीलिए ज़िन्दगी हैं.
तोड़ बंदिशे उन रूमानी जंजीरों की,
निकल पड़ी हूँ खुद करने न्याय सम्मान का.
निकल गया हैं दम अब झापड़ और
उस भयानक मार-पीट का.
नीली पड़ती पीठ भी रोक न पायेगी रास्ता उम्मीदों का.
सांस ले रही हूँ मैं पाने अधिकार प्यार का.
शायद अभी भी जिन्दा हूँ मैं इसीलिए ज़िन्दगी हैं.

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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

deepak pande के द्वारा
November 12, 2014

Aadarniya neha jee pranam sunder marmik aur prernaprad kavita umda lekhan

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
November 12, 2014

शायद अभी भी ज़िंदा हूँ मैं इसीलिए ज़िन्दगी हैं………..नेहा जी, सुदंर कविता…. मन को कहीं छूती हुई ।

Neha Verma के द्वारा
November 12, 2014

धन्यवाद विष्ट जी…

Neha Verma के द्वारा
November 12, 2014

धन्यवाद दीपक जी… सादर प्रणाम आपको।


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